
श्रीमद्भगवद्गीता: जीव-क्षेत्र कहाँ है? - भाग 13 | Shrimadbhagavadgita: Jeev Kshetra Kahan Hai? - Bhaag 13
byDr. Rajesh Takyar
About the Book
श्रीमद्भगवद्गीता के इस तेरहवें भाग में श्रीकृष्ण बताते हैं कि मानव-शरीर एक क्षेत्र यानि खेत है। उसमें शरीर का स्वामी जो बोता है, उसे वही प्राप्त होता है। इसमें कुल 34 श्लोक हैं। संग ही माधव ये भी कहते हैं कि उस शरीर में बसा आत्मा क्षेत्रज्ञ है। क्षेत्रज्ञ ही सब कुछ जानता है, अनुभव करता है, पर स्वयं कर्म में लिप्त नहीं होता।
आत्मा और परमात्मा एक ही होने के कारण मैं उस क्षेत्र के बारे में सब कुछ जानता हूँ। सब शरीरों का क्षेत्रज्ञ मैं ही हूँ। इस भाग में वे अहंकार, क्षमा, शुद्धि, सरलता, इन्द्रियों का निग्रह, जन्म-मृत्यु, जरा-रोग और परमात्मा से भक्ति कैसे करें; सब बताते हैं । इनको जानना ही ज्ञान है।
यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो जीवन के गूढ़ सत्य को समझना चाहते हैं और बाहरी जगत से परे अपनी आंतरिक चेतना से जुड़ने की यात्रा पर जा रहे हैं। ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ का यह ज्ञान, समझने के लिए नहीं बल्कि जीने के लिए है और यही गुण इसे विशेष बनाता है।
आत्मा और परमात्मा एक ही होने के कारण मैं उस क्षेत्र के बारे में सब कुछ जानता हूँ। सब शरीरों का क्षेत्रज्ञ मैं ही हूँ। इस भाग में वे अहंकार, क्षमा, शुद्धि, सरलता, इन्द्रियों का निग्रह, जन्म-मृत्यु, जरा-रोग और परमात्मा से भक्ति कैसे करें; सब बताते हैं । इनको जानना ही ज्ञान है।
यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो जीवन के गूढ़ सत्य को समझना चाहते हैं और बाहरी जगत से परे अपनी आंतरिक चेतना से जुड़ने की यात्रा पर जा रहे हैं। ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ का यह ज्ञान, समझने के लिए नहीं बल्कि जीने के लिए है और यही गुण इसे विशेष बनाता है।
