
श्रीमद्भगवद्गीता - कर्म क्या है (Karm Kya Hai)
byDr. Rajesh Takyar
About the Book
भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं से प्रेरित यह पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय पर आधारित है, जिसमें संन्यास और कर्मयोग के गूढ़ अर्थों को सरल, आधुनिक और व्यावहारिक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताते हैं कि सच्चा संन्यास कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि कर्मफल की आसक्ति का त्याग है, और संसार में रहते हुए निष्काम भाव से कर्म करना ही वास्तविक योग है। ज्ञान और कर्म—दोनों ही एक ही परम सत्य की ओर ले जाने वाले मार्ग हैं, और मुक्ति बाहरी त्याग में नहीं बल्कि भीतर की समता, संयम और आत्मबोध में निहित है। जब मनुष्य सबमें एक ही आत्मा का दर्शन करता है, काम और क्रोध पर विजय पाता है, और ईश्वर को अपना परम मित्र मान लेता है, तभी वह वास्तविक शांति और ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करता है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में यह पुस्तक हमें स्मरण कराती है कि संतुलन, समदृष्टि और निष्काम कर्म ही स्थायी शांति और सच्ची सफलता का मार्ग हैं।
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