
श्रीमद्भगवद्गीता: एक ब्रह्म - भाग 15
byडॉ. राजेश तकयार
About the Book
श्रीकृष्ण संसार को एक रहस्य से परिचित करा रहे हैं कि संसार अश्वत्थ वृक्ष अर्थात्
उल्टे पीपल के वृक्ष की तरह है। इसकी जड़ें ऊपर परब्रह्म में हैं और शाखाएँ नीचे हैं। मूल वृक्ष
कर्म और वासनाओं से पोषित होता है। जो मानव ज्ञान से इस वृक्ष की जड़ को काट देता है,
वही मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होता है।
लेकिन वे ये भी कहते हैं कि सामान्य मानव वृक्ष की टहनियों में ही उलझा रहता है; ऊपर जड़ तक वह देख ही नहीं पाता। पर इस वृक्ष को ज्ञान के द्वारा काटा जा सकता है, ऊपर भी पहुँचा जा सकता है। इस बारे में श्रीकृष्ण ने जो अर्जुन से कहा उसे लेखक ने बहुत सरल शब्दों में समझाया है।
इस भाग में 20 श्लोक हैं। हर मानव के लिए वह श्लोक जानने बहुत ज़रूरी हैं। क्योंकि अगर मानव ये जानता ही नहीं कि उसका बंधन है क्या, तो वह किसे काटेगा। इस भाग में परम पुरुष की पहचान, आत्मा की स्थिति, और भक्ति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग समझ आता है।
माधव संकेत देते हैं कि जीवन में जो आप पकड़ कर बैठे हैं, वह बंधन भी हो सकता है। और जो खोज रहे हैं, वह तो दृष्टि से बहुत परे है। यह पुस्तक पाठक को बताती है कि आप किससे जुड़े हैं और किसकी ओर जा रहे हैं।
लेकिन वे ये भी कहते हैं कि सामान्य मानव वृक्ष की टहनियों में ही उलझा रहता है; ऊपर जड़ तक वह देख ही नहीं पाता। पर इस वृक्ष को ज्ञान के द्वारा काटा जा सकता है, ऊपर भी पहुँचा जा सकता है। इस बारे में श्रीकृष्ण ने जो अर्जुन से कहा उसे लेखक ने बहुत सरल शब्दों में समझाया है।
इस भाग में 20 श्लोक हैं। हर मानव के लिए वह श्लोक जानने बहुत ज़रूरी हैं। क्योंकि अगर मानव ये जानता ही नहीं कि उसका बंधन है क्या, तो वह किसे काटेगा। इस भाग में परम पुरुष की पहचान, आत्मा की स्थिति, और भक्ति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग समझ आता है।
माधव संकेत देते हैं कि जीवन में जो आप पकड़ कर बैठे हैं, वह बंधन भी हो सकता है। और जो खोज रहे हैं, वह तो दृष्टि से बहुत परे है। यह पुस्तक पाठक को बताती है कि आप किससे जुड़े हैं और किसकी ओर जा रहे हैं।
